*सुर्खियाँ मुख्यालय की, पर सिसकियाँ बीहड़ के अंचल की, मदद का रुख कब मुड़ेगा.?RK*…🖊️
जिला मुख्यालय की ‘स्टेशन रोड’ की अपनी एक अलग पहचान है। जब भी जनपद में समाजसेवा, राहत वितरण या मानवीय सरोकारों की बात होती है, तो निगाहें इसी एक सड़क पर आकर ठहर जाती हैं। समाजसेवी हों, बड़े अधिकारी हों या फिर माननीय मंत्री—सबकी गतिविधियाँ यहीं सिमटकर रह जाती हैं। निस्संदेह, वहाँ मौजूद ज़रूरतमंदों को सहायता मिलनी चाहिए, लेकिन क्या हमारे जनपद की सीमाएँ और गरीबों की पीड़ा सिर्फ़ इसी एक मार्ग तक सीमित हैं? बीते दिनों जनपद के माननीय जनप्रतिनिधियों के साथ मंत्री जी ने स्टेशन रोड पर कंबल वितरण किया। यह आयोजन सुर्खियों में रहा, तस्वीरें वायरल हुईं और समाजसेवा के दावे फिर से दोहराए गए। लेकिन उसी समय मुख्यालय से दूर कालपी, कोंच, जालौन, माधौगढ़ तहसील और कदौरा के उन गांवों पर किसी की नज़र नहीं गई, जहाँ हालिया भीषण बाढ़ ने लोगों से सब कुछ छीन लिया है। संभव है कि मंत्री जी तक इन क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी न पहुँची हो, लेकिन जनपद के माननीयों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या बीहड़ और ग्रामीण अंचलों के लोग अब ‘संपन्न’ हो चुके हैं? हकीकत इससे ठीक उलट है। स्टेशन रोड पर मदद खुद चलकर पहुँच जाती है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी गरीब परिवार हाड़ कंपा देने वाली ठंड में फटे-पुराने कपड़ों के सहारे रातें काटने को मजबूर हैं। बाढ़ के बाद जिनकी झोपड़ियाँ उजड़ गईं, उनके लिए राहत आज भी सिर्फ़ एक इंतज़ार बनकर रह गई है। जब मुख्यालय की राहत वितरण की खबरें अख़बारों और सोशल मीडिया के ज़रिये गांवों तक पहुँचती होंगी, तो वहाँ के गरीबों की आंखों में भी उम्मीद जगती होगी। उन्हें भी लगता होगा कि शायद कोई गाड़ी उनके गांव की कच्ची पगडंडी पर भी रुकेगी। शायद उनकी उजड़ी गृहस्थी में भी कोई कंबल, कोई राहत सामग्री पहुंचेगी। लेकिन अफ़सोस—अधिकतर मदद मुख्यालय के शोर-शराबे में ही दम तोड़ देती है। अब ज़िम्मेदारों और समाजसेवियों को अपनी दृष्टि का दायरा बढ़ाना होगा। सहायता को केवल फोटो और प्रचार तक सीमित न रखकर वहाँ तक पहुँचाना होगा, जहाँ उसकी वास्तविक ज़रूरत है। उन परिवारों तक, जिनकी गृहस्थी पानी में बह गई। उन बच्चों तक, जो नंगे पांव ठंड में स्कूल जाने को मजबूर हैं। उन बुज़ुर्गों तक, जिनकी कांपती देह आज भी एक कंबल की आस लगाए बैठी है। मदद का असली मूल्य तब है, जब वह उस व्यक्ति तक पहुँचे जो मांग नहीं सकता—जो मुख्यालय तक आ नहीं सकता। स्टेशन रोड की चमक बहुत हो चुकी, अब समय है कि हम जनपद के उन अंधेरे कोनों की ओर भी कदम बढ़ाएं, जहाँ इंसानियत आज भी हमारी राह देख रही है।