*गणेश (संकठा)चतुर्थी का होता है बड़ा महत्व- ज्योतिर्विद संजय रावत :-रिपोर्ट-रविकांत द्विवेदी जालौन*
ग्रामीण एडिटर कृष्ण कुमार
हिंदू शास्त्र के अनुसार माघ माह में आने वाली संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है। इस दिन मां अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए कामना कर भगवान गणेश की उपासना करती हैं, और दिन भर निर्जला उपवास करती हैं। यह बात ज्योतिर्विद पं. संजय रावत शास्त्री राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय सनातन धर्म रक्षिणी सेवा समिति ने कही। पण्डित संजय रावत ने बताया कि संकष्टी चतुर्थी का यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित है, क्योंकि हिन्दू मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी के दिन ही भगवान गणेश के जीवन पर बहुत बड़ा संकट आया था। इस साल संकष्टी चतुर्थी रविवार के दिन 31 जनवरी को है। ऐसी मान्यता है कि, इस दिन जो भी माता भगवान गणेश को स्मरण कर पूरे विधि-विधान के साथ व्रत करती है, उसकी संतान हमेशा निरोग रहती है। भगवान गणेश की उसपर विशेष कृपा होती है। उन्होंने बताया कि आज के दिन प्रात:काल उठकर स्नान करके लाल वस्त्र धारण करें व भगवान गणेश की पूजा करें। पूजा के वक्त माता लक्ष्मी की भी मूर्ति ज़रुर रखें। दिनभर निर्जला उपवास करें। रात में चाँद को अर्घ्य दें, गणेश जी की पूजा कर फिर फलहार करें, संभव हो तो फलहार में केवल मीठा व्यजंन ही खाए, सेंधा नमक का भी सेवन ना करें। इस दिन की पूजा में गणेश मंत्र का जाप करना बेहद फलदाई बताया गया है। गणेश मंत्र का जाप करते हुए 21 दुर्वा भगवान गणेश को अर्पित करना भी बेहद शुभ होता है। इसके अलावा भगवान गणेश को लड्डू बेहद पसंद होते हैं। ऐसे में इस दिन की पूजा में अन्य भागों के साथ आप बूंदी के लड्डू का भोग लगा सकते हैं। लड्डू के अलावा इस दिन गन्ना, शकरकंद, गुड़, तिल से बनी वस्तुएं, गुड़ से बने हुए लड्डू और घी अर्पित करना बेहद ही शुभ माना जाता है। उन्होने बताया कि हिंदू धर्म में किए जाने वाले सभी व्रत और त्योहार किसी ना किसी देवी देवता से संबंधित होते हैं। ठीक उसी तरह संकष्टी चौथ का यह व्रत भगवान गणेश से संबंधित माना गया है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विधान बताया जाता है। मान्यता है कि, जो कोई भी व्यक्ति संकष्टी चतुर्थी का व्रत करता है उनके जीवन में भगवान गणेश सुख, समृद्धि का वरदान देते हैं। इसके अलावा यह व्रत संतान की लंबी उम्र की कामना के लिए सबसे उत्तम माना गया है। सिर्फ इतना ही नहीं यदि किसी बच्चे के जीवन में पढ़ाई से संबंधित कोई विघ्न, बाधा या परेशानी आ रही हो तो माताओं द्वारा किया जाने वाला यह व्रत बच्चे की उस तकलीफ़ को या परेशानी को भी दूर करता है। ऐसे संतान पर भगवान गणेश जी की कृपा और आशीर्वाद ताउम्र बना रहता है। इस दिन चंद्रमा की पूजा से पहले तक माताएं अपने बच्चों के लिए निर्जला उपवास रखती हैं और इस दिन के भोग में भगवान गणेश को तिल, गुड़, गन्ना इत्यादि चढ़ाया जाता है। उन्होंने कहा कि पौराणिक कथा के अनुसार संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश पर सबसे बड़ा संकट आकर टला था, इसलिए इस दिन का नाम संकष्टी चतुर्थी पड़ा है। कथा के अनुसार एक दिन मां पार्वती स्नान करने के लिए जा रही थी। तभी उन्होंने अपने पुत्र गणेश को दरवाज़े के बाहर पहरा देने का आदेश दिया और बोली, ‘जबतक मैं स्नान करके ना लौटी किसी को भी अंदर आने की इजाज़त मत देना।’ भगवान गणेश भी मां की आज्ञा का पालन करने लगे और बाहर खड़े होकर पहरा देने लगे। ठीक उसी वक्त भगवान शिव माता पार्वती से मिलने पहुंचे। परंतु गणेश जी ने भगवान शिव को दरवाज़े के बाहर ही रोक दिया । ऐसा देख शिव जी को गुस्सा आ गया और उन्होंने अपने त्रिशूल से वार कर गणेश जी की गर्दन धड़ से अलग कर दी। इधर पार्वती जी ने बाहर से आ रही आवाज़ सुनी तो वह भागती हुई बाहर आईं, पुत्र गणेश की कटी हुई गर्दन देख अत्यंत घबरा गई, और शिव जी से अपने बेटे के प्राण वापस लाने की गुहार लगाने लगी। शिव जी ने माता पार्वती की आज्ञा मानते हुए, गणेश जी पर एक हाथी के बच्चे का सिर लगाकर उन्हें पुनः जीवन दान दे दिया और उसी दिन से सभी महिलाएं अपने बच्चों की सलामती के लिए गणेश चतुर्थी का व्रत करने लगी।