*आखिर एक मां ने आंचल की छांव में पल रहे मासूम बच्चों को क्यों आग की लपटों में समा दिया.?*
*17 तारीख को मांग में भरी थी सिंदूर की लकीर…* *और 17 तारीख को आरती की अर्थी*…
*आरती ने क्यों उठाया बेटियों संग मौत चुनने का कदम.?*
शादी से ठीक एक दिन पहले—जब घर में मंडप सजने की तैयारियाँ चल रही थीं, मेहमान आने वाले थे और आँगन खुशियों से भरने वाला था—उसी घर से सोमवार तड़के उठी चीखों ने पूरे गांव को हिलाकर रख दिया।
सुबह लगभग 5:30 बजे, जिस घर में शहनाई बजनी थी, वहाँ आग की लपटों में एक मां और उसकी दो मासूम बेटियाँ जलकर खाक हो गईं।
*सबके मन में एक ही सवाल*—
आखिर किस दर्द ने आरती को इतना मजबूर कर दिया कि उसने अपनी ही संतानों को डीजल उड़ेलकर आग के हवाले कर दिया?
*7 साल का साथ… और फिर 17 तारीख का मनहूस दिन*
आरती की शादी 17 जून 2017 को डाढ़ी गांव के देवेंद्र से हुई थी। सात साल पहले अग्नि के फेरे लिए थे… और 8 साल 5 महीने बाद फिर अग्नि ही उसकी मंज़िल बन गई। इसे संयोग कहें या विडंबना, लेकिन दोनों बार तारीख वही—17 एक दिन उसने सात फेरे लिए थे… दूसरे दिन सात कदम भी नहीं चल पाई और अर्थी पर ले जाई गई।
*आरती तीन साल से नहीं गई थी अपने मायके*
गांव में चर्चाएँ तेज हैं। परिवार और रिश्तेदार भी अब कई सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं।
तीन साल से आरती मायके नहीं गई थी।
यहां तक कि भाई के पुत्र रत्न के कुआँ पूजन में जाने की भी अनुमति नहीं मिली थी।
रिश्तेदारों का कहना है कि आरती अक्सर चुप-चुप रहती थी, लेकिन उसने अपने मन की बात कभी खुलकर नहीं कही।
*घर में शादी, बाहर मातम*…?
घटना के 10 घंटे बाद भी इस कदम की असली वजह एक पहेली बनी हुई है। पुलिस अफसर, गांव के लोग, मायके और ससुराल पक्ष—सब अपनी-अपनी तरफ से कारण ढूंढने में लगे हैं, पर कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पाया।
लोगों को सिर्फ इतना पता है कि— जिस मां का आंचल बच्चों की ढाल होता है, वही मां अपनी बेटियों को आग की लपटों में ले गई… यह सोचकर ही गांव का दिल दहल उठा है।
*आखिर क्यों बदली आरती.?*
क्या मानसिक दबाव था?
क्या किसी ने उसे प्रताड़ित किया?
क्या मायके से दूरी ने उसे तोड़ दिया?
या कोई ऐसा राज़ था जो उसने अपने साथ ही जला दिया?
*अभी पुलिस जांच में कई अहम पहलू सामने आने बाकी हैं।*