आयु के अनुसार आहार से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता वढती है-डॉ अभय
* आयुर्वेद में वर्णित 16 संस्कारो में अन्नप्राशन एवं फल प्राशन आदि के रूप में आचार्य सुश्रुत, वाग्यह ,कश्यप के मत आहार के विषय में प्राप्त होते है वैसे तो बच्चों में दुग्ध को पूर्ण आहार सभी आचार्यों ने माना है
* आज के परिवेश में देखने को मिलता है कि बच्चा को आयु ६: माह से कम है और माँ उसे जटिल आहार प्रारम्भ कर देती है जो कि सुपाच्य न होने के कारण वच्चा बार-बार वीमार हो जाता है बच्चा अगर माँ के दुग्धपान पर आधारित है तो उसे ६ः भाह तक जल और जटिल आहार से दूर रखे तो वच्चा की वृदि में लाभकारी होता है क्योकि माँ के दुग्ध मे पुर्ण आहार एवं जल की पर्याप्त मात्र मिल जाती है:-
* वयानुसार कुछ सामान्य आहार-
तृतीय – चतुर्थ महीने के बच्चों में-:
गौं या भैंस का दूध, फलो का रस हरी सस्ची को उबाल कर उसमें नमक मिलाकर उसका पानी, अरहर या मूंग के दाल का पानी बच्चो को देना उचित है।
छे महीने के बाद के बच्चों में-:
दूध, सादा उबला हुआ चावल, दाल डालकर खिचड़ी जिसमें सब्ज़ी भी पड़ी हो, मूंग दाल की खिचडी, खीर,आटे या सूजी का हलवा (घी कम)दलिया, दाल में रोटी,भूनी मूंगफली और गुड़ का लड्डू • आलू, लौकी, परखर, तरोई, पालक पकाकर नमक युक्त ।
* केला, अमरूद, आम पपीता, सेव आदि पीस कर दें।
सोयावीन भिगोकर छिल्का उतार दीजिए,उसकी दाल बनाकर सुखाकर भूनकर आटा बनाकर आटे का प्रयोग करे यथा –
एक कटोरी गेहूँ का आटा १/४ कटोरी सोयावीन आटा का लहू या खीर बनाकर इसका प्रयोग 7 से 15 दिन पर करना चाहिए।
* 4-8 माह के शिशु को अरहर की दाल, दही (मीठी )छाज देना, फटे दूध का पानी, अण्डा आदि भी दे सकते है.
समयानुसार आहार विधि-
प्रातः 6-7 बजे-दूध
प्रातः 10 बजे-पका चावल, दाल या खिचड़ी या सब्ज़ी का सूप
मध्यान १२ बजे-केला, चीनी से बना हलवा
सायं 3 बजे-दूध
सायं 6 बजे-फलाहर
रात्रि 8 बजे– उपरोक्त विधि से आहार (जो ऊपर वर्णित है)
रात में सोते समय-दूध
नियम का पालन करने से बच्चो की शारीरिक और मानसिक वृद्धि होती है