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महामृत्युंजय मंत्र एक विशिष्ट योग है –आचार्य पं कमलाकांत अरजरिया

ByNeeraj sahu

Nov 29, 2024

महामृत्युंजय मंत्र एक विशिष्ट योग है –आचार्य पं कमलाकांत अरजरिया
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समथर नगर के मुहल्ला हरीपुरी में सर्वेश्वर महादेव मंदिर पर चल रही शिव महापुराण कथा के तीसरे दिन अन्तर्राष्ट्रीय भागवताचार्य पं कमलाकांत अरजरिया ने शिव महापुराण कथा के चौथे दिन कहा कि “अपूज्या यत्र पूज्यंते पूज्यनां च व्यतिक्रम: त्रीणि तत्र प्रवर्तंते दुर्भिक्षं मरणं भयम्,–अर्थात्– शिव पुराण के अनुसार जहां अपूज्यनीयों की पूजा होती हो पूज्यनीयों का तिरस्कार होता हो वहां तीन बातें स्वत:प्रगट हो जाती है अकाल, आत्महत्या, और अकारण भय प्रजापति दक्ष ने परम पूज्य देवाधिदेव महादेव का वृहस्पतिसव नामक यज्ञ किया और शिव जी को न वुलाकर शिव जी का तिरस्कार किया , फलस्वरूप दक्ष प्रजापति का यज्ञ विध्वंस हुआ, जगतमाता सती ने अपने प्राणों को जला दिया,वीरभद्र के द्वारा अकाल मौतें हुई,सभी उपस्थित लोग भयभीत हुए,,यज्ञ कर्ता यजमान का धर्म है कि यज्ञ करते समय अभिमानं सुरा पानं -अभिमान को मदिरा की तरह त्याग कर पूज्यनीय लोगों का सम्मान करते हुए यज्ञ अनुष्ठान करे तो तो यज्ञ कर्ता को यज्ञ का उत्तम फल प्राप्त होगा, महामृत्युंजय मंत्र की वैदिक ऋचा की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि- त्र्यंबकम् यजामहे च त्रैलोक्यं पितरं प्रभुम् –अर्थात्– मैं त्रैलोक्य के पिता त्रिनेत्र धारी अर्थात जिनके नेत्रों में सूर्य सोम और अग्नि तीनों मंडल व्याप्त है सत्व रज तम तीनों गुणों से परिपूर्ण शिव की आराधना करता हूं —-सुगंधिं पुष्टि वर्धनम –अर्थात्– देवाधिदेव महादेव जो जीवन में सुगंध और पुष्टि के वृद्धि कर्ता है –पुष्टिवर्धनं –अर्थात्– जिनके द्वारा सम्पूर्ण प्रकृति की पुष्टि होती है -उर्वारुक मिव बन्धनान्मृत्योरमुक्षीय मामृतात् –अर्थात्– जैसे खरबूजा, ककडी, पक जाने पर लता बंधन से मुक्त हो जाता है उसी तरह हे प्रभु मै भी मृत्यु रुप बंधन से मुक्त हो जाऊ इस वैदिक ऋचा में प्रणव प्रासाद व्याहृतियां उचित में संयुक्त कर उचित विधि से पात्र व्यक्ति से अनुष्ठान करवाने से शिव कृपा प्राप्त हो जाती है,, महामृत्युंजय मंत्र एक विशिष्ट योग है,,इसके पूर्व श्री आचार्य जी ने आगे कुबेर की कथा में सुनाया कि शिव जैसा दयालु और कोई नहीं एक गुणनिधि नामक चोर सभी दुर्गुणों से सम्पन्न था पर उसने शिव मंदिर में प्रकाश किया तो उसका जीवन प्रकाशित हो गया वह वंगाल के राजा अरंदम का पुत्र दम वना और जब वही दम जब स्वयं राजा वना तो उसने राजाज्ञा जारी कर दी कि हमारे राज्य में वही रहेगा जो शिव मंदिर में दीप प्रज्ज्वलित कर दान करेगा,इस कृत्य से महादेव इतने प्रसन्न हुए कि उसे अलका पुरी का राजा कुबेर वना दिया,,यह भगवान शिव की कृपा है, इसीलिए कहा गया है कि “शिव समान दाता नहीं विपत्ति विडावन हार,लज्जा मोरी राखियो नंदी के असवार –शिव पुराण के वेद व पुराण पाठी के पद पर पं विष्णु पाठक,पं रमाकांत कौशिक, पं आनंद द्विवेदी, पं मोहित चतुर्वेदी,पं राम किशुन द्विवेदी, पं पंकज पटैरिया, पं रामनरेश सूरौठिया ,हारमोनियम बांसुरी पर राजा भइया गौतम,तबले पर सौरभ गोस्वामी,पैड राहुल लोधी (पिछोर)कलाकारों ने संगत दी कथा की आरती श्रीमती प्रियंका मुकेश चंचौदिया ने की,इस अवसर पर पं विनोद,पं उमाशंकर,पं रमाकांत,पं पंकज अनिल , जीतेन्द्र कद्दू महाराज युवराज अमित कलश मिश्रा प्रिंस ,सक्षम पार्थ सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने कथा का आनंद लिया,,ल्ला हरी पुरी

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