प्रकृति के साथ जीवन जीना चाहिये: आर्यिका पूर्णमति
झांसी। चाहे कुछ भी हो जीवन यापन प्रकृति में करना चाहिये। प्रकृति के विरूद्ध जीवन जीने पर हमारे ऊपर विपरीत प्रभाव पडता है, जो आम जन मानस के लिये हानिकारक है। जैसे-जैसे मनुष्य आधुनिकता की दौड में शामिल होता चला गया वैसे-वैसे उसके जीवन में छल, कपट की बढोत्तरी होती चली गई। परिणामस्वरूप उसके भीतर बुराईयों ने जन्म ले लिया। यह सदबचन करगुवांजी में धर्मसभा में बोलते हुये आर्यिका पूर्णमति माताजी ने कहे।
समय-सार ग्रन्थ पर दिव्य देशना देते हुये गुरू मां ने कहा कि पहले मनुष्य मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करता था तब रिश्ते आपस में मजबूत और धरती से जुडे हुये थे किन्तु समय बदला और पीतल के बर्तनों का दौर शुरू हुआ तो लोग 6-8 महीने में रिश्ते चमकाते रहे, फिर कांच के बर्तनो का समय आया तो रिश्ते भी आपस में कांच की तरह टूटने – बिखरने लगे लेकिन अब तो थर्माकाॅल आदि के बर्तनों का जब से चलन प्रारम्भ हुआ लोगों के रिश्ते भी यूज एण्ड थ्रो की तरह बन गये हैं।
ज्ञानधारा की सरिता का पावन प्रवाह कराते हुये उन्होंने कहा कि अधिकांश प्राणी स्वार्थी बनकर जीवन जीना चाहता है जो उसके स्वयं एवं समाज दोंनों के लिये ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि स्वार्थी नहीं परमार्थी और अच्छा जीवन जीना चाहिये। अच्छे काम और व्यक्ति की अच्छाईयां सदैव स्मरण किये जाते हैं और बुराईयों पर लोग थूकते हैं। अच्छे कर्मों का फल अच्छा ही होता है किन्तु पूर्व में हमारे कर्म यदि बुरे रहे हैं तो उनका परिणाम तो हमें हर हाल में भोगना ही होगा। किसी के गुणों की प्रशंसा करने में अपना समय नष्ट मत करो उसके गुणों को अपनाने का प्रयत्न करो।
प्रारम्भ में वीरेन्द्र कुमार जैन टीकमगढ,, इंजी0 हुकुमचन्द्र जैन, नीरज जैन, इंजी शशांक जैन, सुधीर जैन ललितपुर, संदीप जैन, विनोद जैन, संजीव जैन ने आचार्य विद्यासागर के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्जवलित कर धर्मसभा का शुभारम्भ कराया। श्रीमती अर्चना, रूबी, राखी जैन, रचना, पूजा, वंदना, गोल्डी, ममता, रीता जैन, सुनीता, अनुपम, शिल्पी, रसना, सुषमा आदि जिनवाणी की सेवा करने वाली महिला मण्डल की सदस्यों ने आर्यिका पूर्णमति को श्रीफल एव भेंटकर आशीर्वाद लिया। इस मौके पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य, सी ए सुमित जैन, राजीव सिर्स आदि मौजूद रहे। संचालन प्रवीण कुमार जैन एवं आभार अशोक रतनसेल्स ने व्यक्त किया ।