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भाषा का मरना, संस्कृति का मरना होता है, मातृभाषा को बचाना हमारी साझी जिम्मेदारी: प्रो. रचना विमल

ByNeeraj sahu

Feb 22, 2025

भाषा का मरना, संस्कृति का मरना होता है, मातृभाषा को बचाना हमारी साझी जिम्मेदारी: प्रो. रचना विमल

हिंदी विभाग में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर कार्यक्रम आयोजित

“नवजात शिशु के लिए दुनिया का पहला अक्षर माँ होता है. उसका भाषा से जुड़ाव यहीं से शुरु होता है. इसलिए अपनी भाषा को मातृभाषा कहा जाता है”, यह उद्गार प्रो. रचना विमल द्वारा व्यक्त किया गया. प्रो. रचना विमल अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कला संकाय एवं हिंदी विभाग द्वारा आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी को संबोधित कर रही थीं. उन्होंने कहा कि दुनिया का हर जीव चाहे वह मनुष्य हो या पशु – पक्षी, अपनी भाषा को पहचानता है. भाषा बेहद जरुरी होती है. भाषा का मरना एक संस्कृति का मरना होता है. यूनेस्को का डाटा है कि दुनिया में 16000 भाषाएं बोली जाती थीं. इनमें से 12000 भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर है. हम स्वयं पश्चिम के प्रभाव में आकर अपनी भाषा को भूलते जा रहे हैं. हमें इससे बचना चाहिए l

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अधिष्ठाता कला संकाय और हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. मुन्ना तिवारी ने कहा कि मातृभाषा को यूनेस्को ने मंजूरी दी है. उन्होंने बताया कि हिंदी विभाग में हिंदी के साथ ही बुंदेली भाषा को युवाओं तक पहुंचाने के लिए भी प्रयास किया जा रहा है. देश और प्रदेश की अन्य बोलियों के बारे में भी विद्यार्थियों को बताया जाता है l

कार्यक्रम के दौरान विश्व रंग अंतरराष्ट्रीय हिंदी ओलंपियाड 2025 का पोस्टर भी लॉन्च किया गया. यह ओलंपियाड 14 से 30 सितंबर 2025 को आयोजित किया जाएगा. इस प्रतियोगिता को 50 से अधिक देशों में आयोजित किया जाएगा. विजेताओं को 1 करोड़ से अधिक के पुरुस्कार दिए जाएंगे. इस दौरान विश्व रंग फाउंडेशन के विकास श्रीवास्तव, प्रो. पुनीत बिसारिया, डॉ. अचला पांडेय, डॉ. श्रीहरि त्रिपाठी, डॉ. बिपिन प्रसाद, नवीन चन्द पटेल, डॉ. आशीष दीक्षित, डॉ. राघवेंद्र कुमार द्विवेदी, रिचा सेंगर, मंजरी श्रीवास्तव सहित बड़ी संख्या में छात्र छात्राएं मौजूद रहे l

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