ग्रामीण एडिटर धीरेंद्र रायकवार
गरौठा झांसी तहसील गरौठा के ग्राम गुढ़ा में श्रृद्धा व उल्लास पूर्वक पारम्परिक पर्व नारे सुआटा का हुआ पूजन समीप वर्ती गांवों में अविवाहित लड़कियों का बुन्देलखण्ड में मनाया जाने वाला पारम्परिक नारे सुआटा त्योहार श्रृद्धा व हर्षोल्लास से मनाया गया आश्विन मास के शुक्लपक्ष की प्रथमा तिथि से प्रारंभ अष्टमी तिथि तक चले इस पारम्परिक पर्व पर कन्याओं ने नित्य प्रति अलख सुबह जागकर नारे सुआटा स्थान पर गाय के गोबर से लीपकर तथा रंग बिरंगी चौक बनाकर गीत गाए बुंदेलखंड का सुआडा खेल शारदीय नवरात्रों में प्रातः खेला जाने वाला खेल नारे सुआटा अब अपनी पहचान खोता जा रहा है क्योंकि ग्रामीण वहीं कुछ ग्रामीण क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गया है ग्रामीण अंचलों में आज भी कुछ पुरानी परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास जारी है मगर व्यस्तता और पाश्चात्य संस्कृति में उलझे लड़के लड़कियां नारे सुआटा जैसी संस्कृति को लगभग भुला ही बैठे हैं अष्टमी की शाम को झिंझरी बनाई जाती है झिझरी एक मटके की बनाई जाती है जिसमें काफी छेद होते हैं उसके अंदर एक दिया जलाया जाता है फिर सभी कुंवारी कन्या सुआटा की झांकी लेकर घर घर जाती हैं और पैसे मांगती हैं बुंदेलखंड की यह परंपरा लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गई है
रिपोर्ट- मुबीन खान गरौठा