*मनुष्य के जीवन में आने वाले सभी संकटों से रक्षा करतीं है माँ कालरात्रि- आचार्य सागर कृष्ण शास्त्री*
आज चैत्र नवरात्रि की सप्तमी का दिन है। आज का दिन माता कालरात्रि का होता है। माँ कालरात्रि की पूजा जीवन में आने वाले अभी संकटों से रक्षा करती हैं। माँ कालरात्रि शत्रु और दुष्टों का संहार करती हैं। यह बात आचार्य सागर कृष्ण शास्त्री भागवताचार्य/श्रीरामकथा वाचक ने कही। भागवताचार्य/श्रीरामकथा वाचक आचार्य सागर कृष्ण शास्त्री ने बताया कि आज के दिन माता कालरात्रि की पूजा का विशेष महत्व होता है। आज का दिन बड़ा ही शुभ दिन माना जाता है। आज के दिन देवी माँ के भक्तों को जल्दी उठना चाहिए और स्नान करने के बाद उन्हें भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए और इसके बाद उन्हें देवी कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि माँ कालरात्रि की मूर्ति पर फूल, कुमकुम भी अर्पित करना चाहिए और उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनके सामने एक तेल का दीपक जलाना चाहिए। सागर कृष्ण शास्त्री ने बताया कि माँ कालरात्रि की पूजा में विधि विधान का बड़ा ही महत्व है, माँ की पूजा में किसी तरह की चूक नहीं होनी चाहिए इसलिये अगर कोई भी भक्त विधि विधान से माँ की पूजा अर्चना अपने घर पर करना चाहता है तो वह या तो मुझसे या किसी विद्वान ब्राह्मण से परामर्श अवश्य करें या हो सके तो उनकी मौजूदगी में ही विधि विधान से पूजन अर्चन किया जाए। सागर कृष्ण शास्त्री ने बताया कि हमारे हिन्दू पौराणिक कथाओं में बताया गया कि माता पार्वती ने राक्षस शुम्भ-निशुंभ और रक्तबीज को मारने के लिए देवी कालरात्रि का अवतार लिया था। भयंकर अवतार लेकर उन्होंने तीनों को मार डाला लेकिन जब रक्तबीज को मार दिया गया था तो उसके रक्त यानि खून ने और अधिक रक्तबीज पैदा कर दिए और उसे रोकने के लिए मां कालरात्रि ने उसका सारा खून ही पी लिया, ताकि रक्तबीज को मार दिया जा सके। उन्होंने बताया कि दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है। सिर के बाल बिखरे हुए होते हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला होती है। अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है। देवी के तीन नेत्र हैं। ये तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। ये गर्दभ की सवारी करती हैं। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग रहता है। इनका रूप भले ही भयंकर हो लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली मां हैं। इसीलिए ये शुभंकरी कहलाईं अर्थात् इनसे भक्तों को किसी भी प्रकार से भयभीत या आतंकित होने की कतई आवश्यकता नहीं। उनके साक्षात्कार से भक्त पुण्य का भागी बनता है। कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं। उंन्होने बताया कि देवी मैया ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है। भागवताचार्य/श्रीराम कथा वाचक आचार्य सागर कृष्ण शास्त्री ने कहा कि नवरात्रि की सप्तमी के दिन माँ कालरात्रि की आराधना का विधान है। इनकी पूजा-अर्चना करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है व दुश्मनों का नाश होता है, तेज बढ़ता है। माँ कालरात्रि की पूजा करने से तनाव, अज्ञात भय और बुरी शक्तियां नष्ट हो जाती है। नवरात्रि के सातवें दिन माँ को गुड़ का भोग चढ़ाएं, इससे आपके जीवन में आकस्मिक आने वाले संकटों से माता रक्षा करती है।