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*पांडवों के अज्ञातवास के दौरान बना माँ जालौन देवी का मन्दिर*

*पांडवों के अज्ञातवास के दौरान बना माँ जालौन देवी का मन्दिर*

*पांडवकाल से ही जल रही माँ की अखंड ज्योति*

बीहड़ क्षेत्र में यमुना नदी के किनारे ग्राम बरीकेपुरवा में बना जालौन माता का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान इसे बनवाया था तब इसका नाम जयंती देवी मंदिर था। कालांतर में इसका नाम कब और कैसे बदला, यह किसी को नहीं मालूम। मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मनौती पूरी होती है।
इस मंदिर में प्रतिदिन सैकड़ों श्रृद्धालु दर्शन करने आते हैं। नवरात्र में तो यहां जनपद के अतिरिक्त अन्य जनपदों के श्रद्धालु एवं प्रदेशों से भी श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस प्राचीन मंदिर में अब तक एक सैकड़ा से अधिक पुजारी नियुक्त हो चुके हैं। पांडवकाल से ही यहां एक अखंड ज्योति जल रही है। पुजारी बराबर इसकी देखरेख करते रहते हैं। यमुना नदी के किनारे बीहड़ में एक ऊंचे टीले पर बना जालौन माता मंदिर कई मील दूर से दिखाई देता है। यहां वर्ष 1980 से वर्ष 2000 के बीच कई इनामी दस्यु सरगनाओं ने घंटे चढ़ाए हैं। पीतल के हर घंटे का वजन एक कुंतल दस किलो है। सैकड़ों छोटे छोटे घंटे भी हैं जो श्रद्धालुओं ने मन्नत पूरी होने पर चढ़ाए हैं। जालौैन माता मंदिर परिसर में धर्मशाला व यात्रियों के ठहरने के लिए कमरे भी बनवाए गये हैं। नवरात्र में माता के दरबार में हजारों श्रृद्धालुओं की भीड़ लगती है हालांकि इस मन्दिर की कई सारी पुरानी प्रथाएं आज भी विधमान है जिसमें एक प्राचीन काल से चली आ रही जबारे व वारी को माता रानी के नाम से मन्नत व आस्था को मानकर बोया जाता है जिसमें नौ दिनों तक मां की अनन्य भक्ति करनी पड़ती है व नौ दिनों तक मां की अखंड ज्योति व झांकी व पण्डाल को भी भव्य रुप में सजाया जाता है अष्टमी व नवमी को मां के दरबार में बारी व जबारे को चढ़ाया जाता है इन सब में मां प्रसन्न करने व इच्छित बरदान स्वरुप प्राचीनकाल से चली आ रही सांग वेदन इस कलयुग में माता की अलौकिक लीला का साफ प्रमाण दिखाई देता है जिसमें भक्त अपनी भक्ति में सराबोर होकर बड़े ही सहज रुप में सांग का वेदन कर लेता है व मां के दरबार में नृत्य करता जाता है।

रविकांत द्विवेदी ,जालौन-यूपी

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