झांसी। व्यक्ति के पास यदि बल होता तो बलवान कहलाताए ज्ञान होता तो ज्ञानवान धन होता तो धनवानए तप होता तो तपस्वी कहलाता है। इसी प्रकार यदि सुख हो तो उसे सुखी कहा जायए लेकिन संसार में बहुत कम लोग हैं जो सुखी हैं। क्योंकि सुख की उत्पत्ति तो आत्मा से होती है। बेटी.बेटा पैदा होनेए व्यापार में अच्छी धन.दौलत मिल जाना आदि वास्तविक सुख नहीं कहा जा सकता है यद्यपि इसे क्षणिक सुख की अनुभूति कहीं जा सकती है। यह सदवचन आर्यिका पूर्णमति ने करगुवां जी में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहे।
आर्यिका रत्न पूर्णमति ने कहा कि बाहरी वस्तुओं के जोड़ से स्वयं के भीतर सुखी होने की मान्यता हो सकती है। बेटा होने पर सुख का अहसास किया जा सकता है किंतु जब वहीं बेटा नाक में दम कर देता है तो जीव पुनरू सुख की तलाश में भटकता है। उन्होंने कहा कि स्थायी सुख चाहते हो तो सोच को पवित्र बनाओ और आत्मा के लिए पुरुषार्थ करो। वे कहती हैं कि शरीर को सजाने.संवारनेए कपड़े आदि पहनने में तो जीव अत्यधिक रुचि लेता है किंतु आत्मा के लिए समय ही नहीं निकालता।
गुरु मां ने कहा कि अपने शरीर या अपनो ;परिजनोंद्ध के लिए जो जीव करता है वह पर समय है किंतु जो आत्मा के लिए करता है वह स्व.समय है। बाहरी दृष्टि में हम सबको रुप सौन्दर्यए गाड़ीए मकान आदि दिखाई देते हैं किंतु यहीं दुष्टि जब अंदर की तरफ जाती है तो वहां आत्मा दिखेगी किंतु आत्मा को देखने के लिए अपनी रुचि एवं चेतना को जगाना होगा। उन्होंने कहा कि पहले सत्य को सुनने की आदत डालेंए फिर सत्य को पचाने की क्षमता बढ़ायें और अंत में सत्य का आचरण करने की शक्ति जाग्रत करो। स्वाध्याय ही आत्मा तक जाने का सम्यक रास्ता है। जब हम पवित्र स्थानए पवित्र माहौल में निर्मल मन से पवित्र वचनों का उच्चारण करते हैं तो उससे सकारात्मक ऊर्जा मिलती है तथा आध्यात्म की भावना जाग्रत होती है। अन्यथा तो स्थिति ऐसी है कि आंखें बंद करते हैं तो भीतर अंधेरा और आंखें खोलते हैं तो बाहर की चकाचौंध दिखाई देती है।
स्थायी सुख चाहते हो तो सोच को पवित्र बनाओ : आर्यिका पूर्णमती