युद्ध की गवाह है जालौन के बैरागढ़ की माँ शारदा रिपोर्ट-रविकांत द्विवेदी
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Apr 6, 2022
युद्ध की गवाह है जालौन के बैरागढ़ की माँ शारदा
आज पूरे देश में चैत्र नवरात्र का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। नौ दिन चलने वाले पर्व पर मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्र पर आज आपको उस ऐतिहासिक मन्दिर की ओर ले चलते हैं जो आखिरी हिन्दूराजा पृथ्वीराज और बुन्देलखंड के वीर योद्धा आल्हा-ऊदल के युद्ध का आज के समय में भी गवाह बना हुआ। यह मन्दिर उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के बैरागढ़ गांव में स्थित है। जो शक्ति पीठ शारदा देवी मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। यहां जालौन से ही नहीं अपितु पूरे दूर-दराज के लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। यहां पर नवरात्र ही नहीं बल्कि पूरे 12 माह श्रद्धालु दर्शन को आते हैं। नवरात्र पर यहां पर भव्य आयोजन किया जाता है। यह शारदा देवी का मन्दिर यूपी के जालौन जिले के उरई मुख्यालय से लगभग 30 किलो मीटर दूरी पर स्थित ग्राम बैरागढ़ में बना हुआ है। यहां पर ज्ञान की देवी सरस्वती मां शारदा के रूप में विराजमान हैं। मां शारदा देवी की अष्टभुजी मूर्ति लाल पत्थर से निर्मित है। मां शारदा का शक्ति पीठ बैरागढ़ मन्दिर की स्थापना चन्देलकालीन राजा टोडलमल द्वारा ग्यारहवी सदी में कराई गई थी। यह मन्दिर सुवेदा ऋषि की तपोस्थली है और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां शारदा को कुंड से प्रकट हुई थी। प्राचीन किवदंतियों के अनुसार कुंड से मां शारदा प्रकट हुई थी इसीलिए इस स्थान को शारदा देवी सिद्ध पीठ कहा जाता है। वर्तमान में यह मन्दिर खेत में स्थित है। मां शारदा शक्ति पीठ के बारे में दर्शन करने वाले लोगों के अनुसार मूर्ति तीन रूपों में दिखाई देती है। सुबह के समय मूर्ति कन्या के रूप में नजर आती है तो दोपहर के समय युवती के रूप में और शाम के समय मां के रूप में मूर्ति दिखाई देती है। जिनके दर्शनों के लिये पूरे भारत वर्ष से श्रद्धालू दर्शन करने आते हैं। मां शारदा शक्ति पीठ पृथ्वीराज और आल्हा के युद्ध की साक्षी है। पृथ्वीराज ने बुन्देलखंड को जीतने के उद्देश्य से ग्यारहवीं सदी के बुन्देलखंड के तत्कालीन चन्देल राजा परमर्दिदेव (राजा परमाल) पर चढ़ाई की थी। उस समय चन्देलों की राजधानी महोबा थी। आल्हा-उदल राजा परमाल के मंत्री के साथ वीर योद्धा भी थे। बैरागढ़ के युद्ध में आल्हा-उदल ने पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में बुरी तरह परास्त कर दिया था। बताया गया कि आल्हा और उदल मां शारदा के उपासक थे। जिसमें आल्हा को मां शारदा का वरदान था कि उन्हें युद्ध में कोई नहीं हरा पायेगा। उदल की मौत के बाद आल्हा ने प्रतिशोध लेते हुये अकेले पृथ्वीराज से युद्ध किया और विजय प्राप्त की थी। उसके बाद आल्हा ने विजय स्वरूप मां शारदा के चरणों में सुरंग गाढ़ दी और युद्ध से बैराग ले लिया। जो आज भी मन्दिर के मठ के ऊपर गढ़ी है। ये सुरंग(सान्ग) 30 फिट से भी ऊंची है। यह सुरंग(सान्ग) जमीन में इतनी ही अधिक गढ़ी है। मन्दिर में आल्हा द्वारा गाड़ी गई सुरंग(सान्ग) इसकी प्राचीनता दर्शाता है। जब आल्हा ने युद्ध से बैराग लिया अभी से यहां का नाम बैरागढ़ पड़ गया। मां शारदा के पूरे देश में सिर्फ दो मन्दिर हैं। देश में ये मन्दिर दो ही स्थान पर है। जिसमें एक जालौन के बैरागढ़ में और दूसरा मध्य प्रदेश के सतना जनपद के मैहर में है। मन्दिर की प्रचीनता और सिद्ध पीठ होने के कारण मां शारदा के दर्शन करने के लिए दूर दराज से श्रद्धालू आते हैं। मन्दिर के पुजारी श्याम जी महाराज का कहना है कि मां शारदा के दर्शन करने प्राचीन समय में आल्हा उदाल आते थे। उन्होंने बताया कि लोग अपनी मनोकामनाओं के लिए चैत्र और शारदीय नवरात्रि पर दर्शन करने आते हैं। जहां विशाल मेला लगता है, जो पूरे एक माह चलता है। मन्दिर के पुजारी के मुताबिक मन्दिर के पीछे एक कुंड है। इस कुंड में नहाने से सभी प्रकार के चरम रोग ख़त्म हो जाते हैं। मन्दिर के पुजारी श्याम महाराज के अनुसार यहां पर आल्हा-उदल का पृथ्वीराज चौहान के बीच युद्ध हुआ था। जिसमें उदल शहीद हो गए थे। इसके बाद आल्हा ने प्रतिशोध लेते हुए अकेले पृथ्वीराज से युद्ध किया और विजय प्राप्त की थी। उसके बाद आल्हा ने विजय स्वरूप मां शारदा के चरणों मे सांग (लोहे का भाला) गाढ़ दिया और युद्ध से बैराग ले लिया। आल्हा के युद्ध से बैराग लेने के बाद इस स्थान का नाम बैरागढ़ पड़ गया। तभी से यहां पर मां शारदा देवी की पूजा होती चली आ रही है।