सैदनगर के डॉ संजय ने महामहिम से पाया पद्म श्री अवार्ड , बढ़ाया जनपद जालौन का सम्मान,रिपोर्ट-रविकांत द्विवेदी
कस्बे के एक छोटे से गांव सैदनगर में जन्मे और पढ़े बढ़े डॉ बीकेएस संजय को उनकी उत्कृष्ट चिकित्सा सेवा के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्मश्री दिया है। गांव में डॉक्टर के सम्मानित होने की खबर पहुंचते ही लोगों में खुशी की लहर छा गई। ग्रामीणों का कहना है कि हालांकि डॉक्टर काफी समय से गांव में नहीं रहते हैं। फिरभी उनको मिले इस महत्वपूर्ण सम्मान ने सभी का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है। वर्तमान में गांव में डॉक्टर के परिवार के कई सदस्य रहते हैं। सभी को बधाई देने वालों का तांता सा लगा है।
बता दें कि डॉ भूपेंद्र कुमार सिंह संजय प्रख्यात हड्डी रोग (सर्जन) हैं और इस वक्त उत्तराखंड के देहरादून में रहते हैं। इनकी चिकित्सीय उपलब्धियों को देखते हुए इनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड और लिम्का बुक रिकार्ड में एवं सामाजिक कार्यों के लिए इंडिया बुक ऑफ रिकार्डस में भी आ चुका है। डॉ संजय ने प्राथमिक ऑर्थोपेडिक शिक्षण एवं प्रशिक्षण पीजीआई चंडीगढ़ व उच्चस्तरीय शिक्षण एवं प्रशिक्षण दुनिया के कई देशों जैसे कि स्वीडन, स्विटजरलैंड, जापान, आस्ट्रेलिया, अमेरिका से प्राप्त की है। वे पीजीआई चंडीगढ़ में एसोसिएट प्रोफेसर व हिमालयन इंस्टीटयूट जॉली ग्रांट में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के पद पर भी कार्य कर चुके हैं। उन्हें जापान ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, न्यूजीलैंड, अमेरिका एवं मलेशिया के विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने का गौरव भी प्राप्त हो चुका है। वर्तमान में वह उत्तराखंड के ऑर्थोपेडिक संघ के संस्थापक अध्यक्ष हैं। फिलहाल डॉ संजय उत्तराखंड चिकित्सा विश्वविद्यालय के कार्यकारणी परिषद् के मनोनीत सदस्य हैं।
डॉ संजय के पिता दयाराम पेशे से किसान थे। जिनका करीब 20 वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो चुका है। सैदनगर के ग्रामीणों ने बताया कि डॉ संजय पांच भाई है। जिनमें राधेलाल सरीला हमीरपुर में अध्यापक हैं, शैलेंद्र कानपुर में बिजली विभाग में अधिशाषी अधिकारी, सुरेंद्र सहारनपुर में शिक्षक और एक भाई इलायची अभी भी सैदनगर में ही रहते हैं। इसके अलावा डॉ संजय की तीन चाचा मोहनलाल, वृंदावन, व श्यामलाल के परिवार के लोग भी रहते हैं। हालांकि इलायची की तबियत ठीक न होने के कारण वे किसी से मिलते जुलते नहीं है। इलायची के दोनों बेटे भी डॉ संजय के साथ देहरादून में ही रहते हैं। गांव वालों को जैसे ही डॉ संजय की उपलब्धि का पता चला तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा।